शनिवार, 25 अक्टूबर 2014

चाटुकारों की चाय पार्टी में आलोचक भी दिखे



चाटुकारों के लिए थी चाय पार्टी लेकिन आलोचक भी दिखे






एक चाय बेचने वाले ने पूरे देश की जनता-नौजवान से लेकर बड़े-बुजुर्गों को अपनी चाय की प्याली में उतार लिया बीति दोपहर जहां देश भर की बहनें अपने भाईयों की लंबी उमर के लिए भइया-दोज का त्यौहार मना रही थीं तो ठीक वहीं दूसरी ओर देश की राजधानी दिल्ली में अशोका रोड़ पर भाजपा के राष्ट्रीय दफ्तर में मोदी देश के दिग्गज-पत्रकारों और संपादकों के साथ चाय की चुस्कियां ले रहे थे।
इस दौरान मोदी के आलोचक या यूं कहें जो नमो लहर को मानने से इंकार किया करते थे वो भी मोदी के साथ सेल्फी लेते दिखे।
इन सबसे एक बार फिर साबित हुआ कि समय परिवर्तनशील होता हैइंसान बड़ा अपने कर्मों और सोच से बड़ा होता है।
जिस राष्ट्र का राजा प्रजा के बीच से उठकर बना हो तो वो प्रजा के साथ अन्याय तो होते नहीं देख पाएगा इतना तो विश्वास है हमें।
तो आप क्या कहेंगे आप क्या कहेंगे या क्या कहते है ये तो हम नहीं जानते लेकिन हम यही समझे कि आपका काम बोलता है-जो भी किया जाए वो लॉन्ग टर्म बेनिफिट को देखकर किया जाए।

लंबी रेस में ही इंसान का एवरेज पता चलता है।। अंकित शर्मा

शुक्रवार, 16 मई 2014

गरारी नहीं अटकी और मोटर चल पड़ी.....


गरारी नहीं अटकी और मोटर चल पड़ी.....




गरारी नहीं अटकी और मोटर चल पड़ी जी हां जैसा कि मैंने लोकसभा चुनाव से चंद दिनों पहले लिखे अपने लेख गरारी अटकनी नहीं चाहिएं में कहा था कि 2014 लोकसभा चुनाव में भाजपा की गरारी अटकनी नहीं चाहिएं और ठीक वैसा ही हुआ—देश में मोदी नाम की तिलस्मी लहर चली और ये लहर नमो को देश के प्रधानमंत्री के तख्त पर बैठाने के बाद ही शांत हुई।।
इस बार देश में कुछ ऐसा हुआ जो पहले कभी नहीं हुआ बच्चे हो या बुजुर्ग-बीजेपी सपोर्टर हो या विरोधी यहां तक की विदेशी मीडिया.. सबकी जुंबा पर बस नमो का ही जाप था, और इन सबका ये जाप तब सफल हुआ जब मोदी ने देश की कमान संभाली।
अगर देखा जाए तो मोदी प्रधानमंत्री पद की रेस में अव्वल आए हैं, और अब उन्होंने 7 आरसीआर में प्रवेश भी कर लिया है लेकिन यहीं से उनकी असली परिक्षा शुरू होगी- उनके लिए सफर कांटो और अंगार से भरा होगा।।
अब ऐसे में देखना ये दिलचस्प होगा कि मोदी ने देश की जनता को अपनी हाई-टैक रैलियों-भाषणों-रोड शो-सोशल मीडिया कैंपेनिंग के जरिए जो सपने दिखाएं हैं क्या वो उनको पूरा कर पाने में कामयाब होंगे, या पिछली बार की तरह अयोध्या राम मंदिर निर्माण की तरह कुचल देंगे और ठंडे बस्ते में डाल देंगे।
बड़े-बुजुर्ग कहते आए हैं और हमने ये खुद देखा भी है कि हम किसी इंसान से अगर ज्यादा महत्वकांक्षाएं रखते है तो हमेशा दुख होता है अगर कहीं इस बार ये देश की जनता के साथ हुआ तो शायद ही किसी राजनेता पर विश्वास कर पाएगी क्योंकि दिल्ली और देश की जनता आम आदमी पार्टी के झूठे वादे और सपनों के टूटने से बड़ी आहत हुई है।
गौरतलब है कि बीते दिनों हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान दिल्ली समेत पूरे देश में आप की लहर थी, इस दौरान देश की जनता का रुख दो भागों में बंट गया एक नमो और दूसरा आप। आप के सामने नमो का जाप फीका होता दिख रहा था लेकिन आम आदमी पार्टी के जहाज को सहारा देने के लिए जब कांग्रेस ने हाथ बढ़ाया तो राजनीति में अभी हाल ही में पनपे नए नवेले जहाज में छेद होते देर नहीं लगी जिसका परिणाम ये हुआ कि ये जहाज जुमा-जुमा दिल्ली की राजनीति के समुद्र में 49 दिन का सफर ही तय कर सका जिसके बाद फिर से लोगों ने नमो जाप शुरू किया और इस बार जो नमो जाप चला तो मोदी को हिंदुस्तान का पीएम के तख्त पर बैठाने और के बाद ही बंद हुआ।।
खैर अब देखना ये दिलचस्प होगा कि देश के लोगों के अच्छे दिन कब से शुरू होते और कब तक रहते हैं

अच्छे दिन आने की उलटी गिनती शुरू....;) :P
(अंकित शर्मा) 














सोमवार, 17 फ़रवरी 2014


सीनियर सिटिजन की श्रेणी में आ खड़ी हो चुकी है पत्रकारिता 

कलम का जोर कम हो चला है आज,
पेड न्यूज का दौर आम हो चला है आज.....


माना कि देश को आजाद कराने और अंग्रेजों से मुक्त कराने में कलम ने एक हथियार की भूमिका निभाई। इस हथियार का इस्तेमाल क्रांतिकारियों ने खूब किया चाहें वो नरम दल हो या गरम दल, सभी ने इसका खूब उपयोग किया और जागरुकता फैलाई। इतना ही नहीं अगर हम और पीछे जाएं तो हमारे वेद-उपनिषद, ग्रंथ आदी भी कलम के जरिए ही लिखे गए हैं।
लेकिन आज हम और हमारे देश को आजाद हुए करीब 67 वर्ष हो चले हैं लेकिन हमारी कलम बद से बद्तर हो चली है-ये कलम चंद कॉर्पोरेटरों-राजनेताओं-भ्रष्टाचारियों-दलालों...की कठपुतली हो चली है। हमारी पत्रकारिता अब उम्र दराज हो चली है,
एक दौर था जब कलम चलाने वालों में एक जुनून हुआ करता था, इस जुनून के चलते वो किसी भी कीमत पर किसी भी खबर को लेकर कोई कंप्रोमाइज नहीं करते थे।
आज इस कलम की कला को व्यापार बना लिया गया है-कलम की जगह पहले टाइपराइटर ने ली-फिर कंप्यूटर ने-अब आप किसी से कह भी नहीं सकते कि आप अपनी कलम का दुरुपयोग कर रहे हैं।
अब आप की कलम की कला की कद्र नहीं है बल्कि आपकी चाटुकारिता की कीमत है-आज न्यूज चैनल्स में खबरों का सौदा होता है- जिसके बाद आपके द्रवारा लिखी गयी खबर का पोस्टमार्टम कर दिया जाता है।

पोस्ट अभी बाकी है आगे की कहानी अगले अंश में.......अंकित शर्मा





बुधवार, 1 जनवरी 2014

मनीष अगर दिल्ली के मुख्यमंत्री बनते तो असली नायक तो वो कहलाते !

मनीष अगर दिल्ली के मुख्यमंत्री बनते तो असली नायक तो वो कहलाते !

दिल्ली के तख्त पर अरविंद केजरीवाल विराजमान हो चुके हैं। सरकार बनाने के चंद घंटों बाद ही उन्होंने अपने वादों के मुताबिक कई बड़े और अहम फैसले लिए और कई घोषणाएं भी कर डाली हैं। देश में जहां पिछले काफी समय से नमो-नमो का जाप चल रहा था तो अब आप-आप के चर्चे हो रहे हैं।
ऑटो वाले से लेकर सर्विस क्लॉस तक, बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सबके बीच में दिन में कम से कम एक बार तो आप का जिक्र छिड ही जाता है। कई नेताओं को सदमा सा बैठ चुका है रात को भी सपने में उन्हें अरविंद नजर आ गए हैं और कई नेताओं को तो आप शब्द से नफरत हो गयी है।  
देश में नमो जाप की जगह आप की लहर सी चल गयी है। जिसने भी अनिल कपूर की अभीनीत फिल्म नायक देखी हो या उसके बारे में सुना हो तो वो उसको अरविंद से जोड़ कर देख रहे हैं।
लेकिन जनाब अगर देखा जाए तो फिल्म नायक में अनिल कपूर का पेशा पत्रकारिता होता है और वहीं दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी में अगर असली नायक की बात की जाए तो वो मनीष सिसोदिया हैं।
आप से जुड़ने से पहले मनीष पेशे से पत्रकार थे। अन्ना के अनशन से आप के फॉउंडेशन तक मनीष का अहम रोल रहा। लेकिन अन्ना के बाद कोई रोल मॉडल बने तो वो अरविंद, आप पार्टी के मुखिया बने तो वो अरविंद ।
तो अगर आप तुलना कर रही रहे हैं तो मनीष की तुलना नायक (अनिल कपूर) से करें क्योंकि मुख्यमंत्री न सही शिक्षा मंत्री की कुर्सी पर बैठते ही उन्होंने फिल्मी नायक वाला काम असल जिंदगी में कर के दिखाया है और कर रहे हैं।

पैदल दफ्तर जा रहे हैं, रैन बसेरों का मुआएना कर रहे हैं और भी काफी कुछ.........लेकिन मेरा ये लिखने का मकसद आप में कोई फूट डालना या आप की निंदा करना नहीं बस एक विचार था जो आपके बीच प्रकट कर दिया.................................अंकित शर्मा....:)