गुरुवार, 19 दिसंबर 2013

काम तो चलाना पड़ता है....बेरोजगारी के इस दौर में

काम तो चलाना पड़ता है....बेरोजगारी के इस दौर में

पैसे न हो तो उधारी से,
सिगरेट न हो तो बीड़ी से,
बीयर न हो तो विस्की से,
विस्की न हो तो रम से,
बोतल न हो तो अद्धे से,
काम तो चलाना पड़ता है।
पेट्रोल महंगा हो तो डीजल से,
डीजल महंगा हो तो सीएनजी से,
सब्जी महंगी हो तो चटनी से,
काम तो चलाना पड़ता है।
नौकरी न हो तो बेगारी से,
बेरोजगारी के इस दौर में,
काम तो चलाना पड़ता है।
मेट्रो का किराया न हो तो बस से,
बस का किराया न हो 11 नंबर की गाड़ी से,
सफर तो तय करना पड़ता है।
मोबाइल में बैलेंस न हो तो,
मिस कॉल से काम चलाना पड़ता है।
चाय की चुस्की का भी मजा एक बटा दो करके लेना पड़ता है,

भाइया बेरोजगारी के इस दौर में काम तो चलाना पड़ता है...................अंकित शर्मा

रविवार, 1 दिसंबर 2013

क्या हो गया....??

रोजगार को गया था बेरोजगार हो गया,
शराफत से चला था बदमाश हो गया।
स्वाभिमान से चला था अभिमान हो गया,
कमाई को चला था कर्जदार हो गया।
चाटुकारो के इस दौर में ये आम हो गया,
कामगार को मिला ठेंगा, लौंडा बेरोजगार हो गया।
बेरोजगारी के दौर में ये कहना आम हो गया
यहां सबको है दुख: आपका नाम हो गया.................
तेजपाल न हो गया बवाल हो गया,
टीवी चैनलों से आसाराम-साईं,
सोने की खुदाई सब गायब हो गया।
खबर ये भी है आप का स्टिंग हो गया,
ताजा सर्वे में आप का हौसला धड़ाम हो गया ।
मीडिया का नाम बदनाम हो गया,
पेड न्यूज का है ये दौर ये कहना आम हो गया।
यहां सबको है दुख: आपका नाम हो गया....................अंकित शर्मा की कलम से

गुरुवार, 21 नवंबर 2013

और भी तेजपाल हैं यहां...



हां यहीं के लोगों को कहते-सुनते, बुदबुदाते-बड़बड़ाते हुआ सुना था कि यहां इस लाइन में ये आम बात है। यहां आगे बढ़ने का रास्ता यहीं से होकर गुजरता है।
फिर आज ये बात जो इस लाइन के लोगों के लिए आम थी जो वो किसी भी नए इंटर्न के सामने कहने से हिचकिचाते नहीं थे। आज क्यों मशहूर खोजी पत्रिका तहलका के एडिटर तरुण तेजपाल के ऊपर उंगलिया उठा रहे हैं।
पर्दा उठा तो,नकाब उठा तो, पोल खुली तो...शर्मसार इस लाइन के भी बड़े-बड़े दिग्गज हो सकते हैं। उनकी भी केबिन के अंदर की कहानी,नाइट शिफ्ट का रोमांस देशवासियों के सामने आ सकता है।
आज एक टीवी चैनल के हेड बड़ी शराफत,बड़ी नजाकत,बड़े इतराते हुए तहलका के एडिटर तरुण तेजपाल के खिलाफ मोर्चा खोल कर अपनी शराफत का परचम लहरा रहे थे।
क्या वो नहीं जानते इस लाइन की गंद को कि यहां क्या-क्या होता है या आप और हम नहीं जानते.....
अभी नींद में स्वपन देख रहा था कि देश में किसी समय संत कहे जाने वाले,पूजे जाने वाले आसाराम,नारायण साईं की तरह इस लाइन के लोगों के ऊपर आरोप लग सकते हैं।
इनमें से भी कुछ फरार हो सकते है....जो साईं को भगौडा बताते है पैकेज चलाते है.....
चलिए जनाब जरा सोच लीजिए बस संभल जाईए यही हिदायत है..मशवरा है....

वरना आसाराम भी बड़े चौडा करते थे आप खबर चलाया करते हैं वो सत्संग कराया करता था..........अंकित शर्मा 

शुक्रवार, 15 नवंबर 2013

मीडिया में टिकना है..?


शुरू से शुरू करू तो काफी पीछे जाना पडेगा मुद्दे की बात काफी देर से आएगी जो कि गलत है इस लिए लेख की शुरूआत से ही लेख के शीर्षक पर बात करूंगा।
जब होश संभाला, जब खुद संभला,जब कलम संभाली,जब सोच संभाली,जब उद्देशय बनाया, अगर कुछ करना है तो यहीं करना है,कुछ बनना है तो यहीं बनना है तो केवल मीडिया को ही चुना।
लेकिन जब इस मीडिया नामी संसार को जो थोड़ा-कुछ जाना , जो कुछ यहां देखा,तो यही जान पडता है कि यहां तो काफी गंद है...बचपन में और स्कूल कॉलेजो में अक्सर अध्यापक-जन  एक कटाक्ष किया करते थे कि एक मछली पूरे तालाब को गंदा कर देती है लेकिन जनाब यहां तो ... पूरा तालाब ही गंदा है मछलियां ही तालाब की गंदगी से मर रही हैं
दोष किसका है,दोषी कौन है....दरअसल ये सब जानते है। लेकिन फिर भी यहां किसी के उपर कोई रोक-टोक नहीं है।
हाल ये है कि पहले सी ही यहां पुरने घाघ बैठे हैं,जो अपनी जेब में कागजों से ज्यादा जीने की दवाई लेकर चल रहे हैं फिर भी डटे हुए हैं, डरे हुए हैं...ताकि कोई नया न आ जाए जो इनकी पोल न खोल देऔर इनकी दलाली में कोई कमी आ जाए इनका हुक्का-पानी न बंद हो जाए ।
आप इस बात से परहेज नहीं कर सकते जैसे देश की कमान कैसे भृष्ट नेताओं और बलात्कारियों के हाथ में हैं ठीक वैसे जैसे कि देश की संसद में आरोपी बैठे हैं, क्रिमिनल बैठे हैं...ठीक वैसे ही यहां चैनलों की कमान,अखबारों की कमान, मीडिया हाउसों की कमान कहीं न कहीं इन्हीं लोगों के हाथों में है, वो एक काफी मशहूर कहावत है चोर-चोर मौसेरे भाई ....आगे आप खुद समझ लो...
अभी तक जहां भी काम किया तो यही जाना,यही समझा कि.....


मीडिया जगत के सत्य वचन- कर्म करोगे तो फल की चिंता करोगे नहीं,
सही काम करोगे और किसी से डरोगे नहीं,
किसी की चिलम भरोगे नहीं,
चाटुकारिता करोगे नहीं,
मेलबाजी करना पसंद करोगे नहीं,
हर वक्त मीटिंग अटैंड करोगे नहीं,
दलाली करोगे नहीं,
खबर बेचोगे नहीं...तो भइय्या एक बात गांठ बांध लो सफल पत्रकार बनोगे नहीं............अंकित शर्मा


मंगलवार, 12 नवंबर 2013

गरारी अटकनी नहीं चाहिएं




अरे ! भईया गरारी अटकनी नहीं चाहिएं......कुछ दिनों से जुमला जुबान से सरपट-सरपट निकलता है। दरअसल ये जुमला हमारे एक मित्र का पसंदीदा डायलॉग है। तो संगत का असर तो आता ही है....मुद्दे की बात करें तो बात फिर मोदी नाम से ही शुरु होगी। अगर आप मोदी के आलोचक हैं या उनके सपोर्टर तो इस बात से आप परहेज नहीं कर सकते की 2014 के लोकसभा चुनाव में कमल का फूल पूरी तरह से खिलने को तैयार है। भाजपा में अकेले मोदी ही हैं जो इस फूल को खिलाने में देसी खाद का काम कर रहे हैं बाकी पेस्टीसाइड्स तो पार्टी में काफी है जो लांग टर्म बेनिफिट देने में असमर्थ हैं अब हम नीतीश कुमार पर नहीं जाएंगे। बात मोदी की है तो मोदी की ही चलेगी दरअसल कांग्रेस भी कह चुकी है कि इस बार अगर भाजपा हारी तो वो समाप्त हो जाएगी, इसी बात को हम गरारी अटक न जाए के जरिए कह रहे हैं। अगर इस बार गरारी अटकी तो मोटर फिर कभी चल न पाएगी.....दरअसल ऐसा मैंने इसलिए कहा क्योंकि ये हम भारतीयों को ये शाप प्राप्त है कि हम अपने उपर हो रहे अत्याचार या यूं कहें कि हम किसी भी गलत के खिलाप ज्यादा समय तक बगावत नहीं कर सकते माना कि हमारे देशवासियों में एक जज्बा है जोश है लेकिन ये शापित है ठीक वैसे ही जैसा कि भगवान हनुमान को बचपन में एक संत के द्वारा किया गया था कि जब कोई तुम्हें प्रोत्साहित करेगा तब तुम्हारी शक्तियां वापस आएंगी।
ऐसा मैनें इसलिए कहा क्योंकि हमारे देश में बीते दिनों क्या हुआ मैं ज्यादा पीछे नहीं जाउंगा आपको ध्यान दिलाना चाहुंगा-रामदेव का रामलीला ग्राउंड में उनशन, अन्ना हजारे का अनशन, दामिनी रेप केस।
इन सब में एक खास बात रही कि हम लिमिटिड समय तक जोश में रहे लडे-गिरे और फिर वापस अपने काम पर लौट चले बिना कुछ हाथ में लिये,बिना न्याय लिये।
 तो इन सब बातों को करने का एक ही मतलब फिर वहीं आकर समाप्त होता है कि गरारी अटकनी नहीं चाहिएं अगर 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी पीएम बनके न उभरे और देश की कमान न संभाल पाए तो  इस देश की जनता तो शापित है जिसकी जुबान पर फिलहाल मोदी और नमो का जो जाप चल रहा है वो बंद हो जाएगा सैकडों देशवासियों की तपस्या भंग हो जाएगी।

ये जनता भूल जाएगी मोदी को............,..........................गरारी अटकनी नहीं चाहिएं(अंकित शर्मा)
भइया कोई बताएगा ये हो क्या रहा इस मीडिया जगत में बीते दिनों नेटवर्क18 में 300से अधिक लोगों की छटनी और अब खबर सहारा मीडिया के गलियारे से आ रही है कि वहां भी छटनी का कार्य प्रगति पर है। एक ओर जहां मीडिय चंद कॉर्पेरेट,राजनेताओँ,माफियाओं,बाबओं की कठपुतली बन चुका है,पहले से ही पेड न्यूज का दौर जोरों पर है,पहले से ही पत्रकार स्वतंत्र नहीं रहा कोई सही खबर चलाने के...फिर क्या दिक्कत आन पड़ी है.........ये झोल मेरी समझ से परे है या तो मैंने अभी ज्यादा समय अभी इन कॉर्पोरेट जगत के लोगों की चिलम भरने में लगाया नहीं या कुछ और.......वैसे एक लाइन पढ़ी थी जर्नलिजम की एक किताब में जिसमें लिखा था पत्रकार के कर्तव्य उसमें लिखा था serve the people,serve the nation लेकिन अब लगता है उस किताब में भी देश के संविधान की तरह संशोधन की जरुरत है...serve the co-orporators,politicians,corrupt people & earn the money.... अंकित शर्मा